गंगा भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? संपूर्ण जानकारी!

 


बचपन से ही हमने कहीं न कहीं जरूर सुना है कि गंगा हमारी मां है। इसकी पूजा की जानी चाहिए। इसके पानी को पवित्र कामों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लेकिन शायद हमने कभी भी इसके पीछे के कारणों को जानने की कोशिश नहीं की। आखिर क्यों हम गंगा को पूजते? क्यों इसको मां का दर्जा दिया जाता है और कैसे यह मनुष्य से लेकर पेड़ पौधों और जीव जंतुओं के लिए इतनी जरूरी बन गई है। 

आज हम गंगा नदी की इसी कहानी को जानेंगे थोड़े रोचक तरीके से। हमेशा से ही ये माना जाता है कि गंगा गोमुख से निकलती है जो कि पूरी तरह सच नहीं है। साइंटिफिक तरीके से देखा जाए तो गंगा का कोई एक सिंगल सोर्स नहीं है बल्कि बहुत सारी छोटी छोटी नदियां और पानी की धाराएं मिलकर गंगा को जन्म देती हैं। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में गंगोत्री ग्लेशियर से निकली एक धारा जिसे हम भागीरथी नदी कहते हैं उसको गंगा का नैचरल सोर्स कहा जाता है। 

हिंदू पौराणिक कथाओं में भी भागीरथी नदी का अनेकों बार जिक्र हुआ है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में भागीरथ नाम के एक राजा हुए थे जिन्होने घोर तपस्या करके स्वर्ग में बहने वाली गंगा को धरती पर बुलाने के लिए शिव जी से वरदान मांगा था। उसके साथ साथ मान्यता ये भी है कि जब गंगा धरती पर आयी तो उसका बहाव बहुत तेज था। तब भगवान शिव ने अपने बालों में गंगा को समेटकर धरती पर रास्ता दिया। जैसा कि हमने कई बार शिव जी की मूर्तियों और फोटोज में भी ध्यान दिया होगा कि उनके बालों में से एक पानी की धारा निकलती है। वहीं गंगा की दूसरी तरफ की नदियों को देखें तो हम पाएंगे कि किस तरह बद्रीनाथ से धौलीगंगा और विष्णु गंगा एक दूसरे से विष्णुप्रयाग में मिलती है और आगे चलके अलकनंदा नदी के नाम से आगे बढती है। विष्णुप्रयाग अलकनंदा नदी के पञ्च प्रयाग में से पहला प्रयाग है। विष्णुप्रयाग वही जगह है जहां नारद मुनि ने भगवान विष्णु की तपस्या की थी और आज यहीं पर उत्तराखंड के लिए एक बहुत जरुरी हाइड्रो पावर प्लांट है जो कि उत्तराखंड के लोगो के लिए करीबन 400 मेगावाट बिजली बनाता है। 

इसी तरह अलकनंदा आगे बढ़ते हुए नंदाकिनी नदी से मिलती है और नंदप्रयाग में उसे खुद में समेटकर आगे बढ़ जाती है। कुछ और आगे जब अलकनंदा नदी चलती है तो पंडा नदी को पाती और उसे भी खुद में समेटकर कर्णप्रयाग से आगे निकल पड़ती है। इसी कर्णप्रयाग की एक दूसरी कहानी ये भी है कि महाभारत के समय में कुंती पुत्र गण यहीं सूर्य देवता की पूजा किया करते थे। वहीं एक और बड़ी नदी मंदाकनी भी केदारनाथ से शुरू होकर अपने बहाव को तेजी से खींचते हुए अलकनंदा से रुद्रप्रयाग में आ मिलती है। यह वही रुद्रप्रयाग है जहां भगवान रुद्रनाथ का मंदिर दोनों नदियों के संगम के बीच में बना हुआ है और हर साल हिंदू श्रद्धालु यहां पूजा करने और मन्नत मांगने आते हैं। पंच प्रयाग में से ही सबसे आखिर में जब अलकनंदा और भागीरथी का मिलन होता है तो उस जगह को कहते हैं देव प्रयाग जिसकी हिन्दू धर्म में एक अपनी अलग पहचान है और इसी पौड़ी से आगे वो नदी बनती है जिसे हम और आप गंगा कहते हैं। यही हमें मिलता है अपने सबसे बड़े सवाल के जवाब कि क्यों गंगा जल को हिंदू धर्म में इतना पवित्र माना जाता है और हर छोटे से बड़े आयोजन में इसका इस्तमाल पवित्र तरीके से किया जाता है। अब तो साइंस ने भी ये बात मानी है कि जिस तरह गंगा नदी प्लेन रीजन में आने से पहले इतनी दूर तक हिमालय के पहाड़ों में बहती है। अलग अलग तरीके के पत्थरों से टकराती है और कई तरह के पेड़ पौधों के बीच से निकलती है। 

इससे ये साबित होता है कि गंगा के पानी में नॉर्मल पानी के बदले कई गुना ज्यादा मिनरल्स और न्यूक्लियर एलिमेंट्स होते हैं जो कि हमारे लिए बहुत फायदेमंद बताए गए। इसी कड़ी में कहानी को आगे बढाएं तो हम पाएंगे कि ऋषिकेश से नीचे उतर कर गंगा नदी अब मैदानी इलाके में आ जाती है और यहां सबसे पहले हरिद्वार पहुंचती है। हरिद्वार अपने आप में ही बहुत सारी कहानियां दबाए बैठा है। पौराणिक कथाओं में यह बात लिखी गई है कि जब समुद्र मंथन से अमृत निकला तो राक्षस उसे लेकर भागने लगे और देवता उनका पीछा करने भागे और जिन चार जगहों पर अमृत की बूंदे गिरी उनमें से एक हरिद्वार भी है। कहा तो यहां तक जाता है कि हर 12 साल में हरिद्वार में लगने वाले कुम्भ में जो भी आदमी गंगा नदी में डुबकी लगाता है, उसके सारे पाप धुल जाते हैं और उसे सीधा स्वर्ग का रास्ता मिल जाता है। हरिद्वार दो अलग अलग शब्दों से मिलकर बना है हरि जिसका अर्थ है भगवान या ईश्वर। वहीं दूसरी तरफ द्वार का अर्थ होता है रास्ता। उत्तर प्रदेश में गंगा के घुसने के बाद सबसे पहले यह प्रयागराज में यमुना नदी को खुद में समा के आगे निकल चलती है। 

यहां कहा जाता है कि धरती के नीचे से बहने वाली सरस्वती नदी भी अदृश्य रूप से गंगा में मिल जाती है और विशालकाय गंगा नदी का निर्माण करती है जो कि आगे बढ़ चलती है। हिंदुओं की एक और बड़ी है। वाराणसी यानि कि काशी की ओर जिसे हिन्दुओ के लिए मोक्ष का द्वार कहा जाता है। गंगा के किनारे काशी में अनेको संत पैदा हुए जिन्होंने मानवता को नई सीख दिखलाई। मणिकर्णिका घाट से लेकर राजा हरिश्चंद्र घाट तक यहां का कण कण खुद में एक कहानी बयान करता है। आदि शंकराचार्य से लेकर कबीर तक गंगा किनारे इस शहर ने बहुत कुछ देखा है। काशी में ही ना फंसे रहते हुए आगे की बात करें तो बिहार के मुंगेर, भागलपुर और पटना से होती हुई ये नदी छठपूजा के श्रद्धालुओं की महिमा को देखते हुए कुछ देर झारखंड में भी बहती है। 

पश्चिम बंगाल में पहुँचते ही गंगा नदी अब दो बड़ी धाराओं में अलग अलग हो जाती है। एक है हुगली जो पश्चिम बंगाल में आगे बढ़ सकती है, वहीं दूसरी है पद्मा जो आगे बांग्लादेश में घुस के गंगा डेल्टा से गुजरती हुई बंगाल की खाड़ी में जाने लगी। पश्चिम बंगाल में रह जाने वाली गंगा नदी अब अपना नाम बदल लेती है और बन जाती है। हुगली नदी जो कि आगे कोलकाता और गंगा सागर। रास्ते हजारों किलोमीटर का सफर तय करती हुई अनेकों लोगों की आशंकाओं के साथ बंगाल की खाड़ी के अथाह सागर में गिर जाती है। यही अगर हम अपने अगले सवाल की ओर कूच करें तो किस तरह गंगा नदी का पानी भारत के जन सामान्य की रूपरेखा को सींचती है तो हम पाएंगे कि उत्तरी और पूर्वी भारत की लगभग आधी से ज्यादा आबादी कहीं न कहीं वजहों से गंगा नदी पर निर्भर है। चाहे वो उत्तराखंड में भागीरथी पर बना टिहरी बांध हो, सोन नदी का बाणसागर बांध हो या फरक्का का विशालकाय बैरेज। ये सभी भारत के निर्माण में एक अहम भूमिका निभाते हैं और बड़ी आबादी की बिजली से लेकर पानी की समस्या का ध्यान रखते हैं। गंगा बेसिन अपनी उपजाऊ मिट्टी के साथ भारत और बांग्लादेश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण। 

गंगा और उसकी सहायक नदियां एक बड़े क्षेत्र को इरीगेशन का प्रमुख सूर्य प्रदान करती है। इसके रास्ते में आने वाले क्षेत्रों में खेती की जाने वाली मुख्य फसलों में चावल, गन्ना, दाल, तिलहन, आलू और गेहूं शामिल है। नदी के किनारे दलदलों और झीलों में फलियाँ मिर्च, सरसों तेल, गन्ना और जूट जैसी फसलें बेहतरीन तरीके से उगाई जाती हैं। इसी के साथ गंगा नदी अपने एक बहुत बड़े वर्ग को मछली पालन और पानी से जुड़े अन्य जीवों की व्यापार का अवसर भी देती है। हम इन्सानों के साथ साथ गंगा नदी, पशु और पक्षियों की भी पालनहार कही जाती है जिसके किनारे अनेकों प्रकार की प्रजातियां सदियों से फलफूल रही है। कई वन्य जीवों और पक्षियों को आश्रय देता है जिसमे ज्यादतर हिरण, जंगली सुअर, जंगली बिल्लियां और छोटी संख्या में इंडियन वोल्फ, गोल्डेन जैकाल और रैड इन बंगाल बॉक्सर्स पाई जाती है। मगरमच्छ से लेकर कछुए और मुख्यतौर पर गंगा रीवर डॉल्फिन। गंगा नदी का प्रमुख आकर्षण है। वैसे अगर इन सबसे हटकर हम दूसरी तरफ ध्यान दें तो पता चलेगा कि किस तरह इसके आस आसपास रहने वाली आबादी इसके खत्म होने का कारण बनती जारी है। चलिए इसको यूं समझते हैं कि गंगा के किनारे आज के समय में लगभग 40 करोड़ लोग रहते हैं जो कि अपने अलग अलग व्यवसाय चलाते हैं। खेती करते हैं, मछली पालन करते हैं और बड़े बड़े उद्योग लगाते हैं। इन्ही उद्योगों से निकलने वाला कूड़ा कचरा, केमिकल वेस्ट और सदियों से अंतिम क्रिया के बाद बहाए जाने वाले मानव अवशेष निरंतर गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता को कम करती जा रही हैं। 

इसलिए इसके पानी को पीना और नहाने से अब अलग अलग तरीके की बीमारियों का होने का खतरा होने लगा है। सरकारें भी समय समय पर नए प्रोग्राम लाती रहती हैं ताकि गंगा को उसके असली रूप में रिवाइव किया जा सके। ऐसी ही एक स्कीम है नमामि गंगे परियोजना दो हज़ार 14 में लाई गई इस योजना के तहत गंगा किनारे आने वाले घाटों, वाइल्ड लाइफ एरिया और जीवों को दोबारा से पुनर्जीवित करने की कोशिश की जा। इस प्रोजेक्ट में दो हज़ार 30 तक 1,34,000 हेक्टेयर भूमि के वनीकरण का लक्ष्य दिया गया जो कि अपने आप में एक सराहनीय बात है। लेकिन एक सच ये भी है कि इकोलॉजी और बायोडायवर्सिटी के जानकार इसे पूरी तरह एक फ्लॉप आइडिया मानते हैं और इस योजना को पूरी तरह नकारते हैं। गंगा नदी के प्राचीन इतिहास हिन्दू धर्म में इसके महत्व और एक बड़ी आबादी पर इसकी निर्भरता को देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि इसके बचाव और संरक्षण की जिम्मेदारी सरकारों के साथ साथ हमारी खुद की भी है और इस दिशा में हमें भी बराबर की भागीदारी निभानी चाहिए। 

Suraj Rai

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