मक्का से जुड़ी कुछ अनसुनी कहानियां

दोस्तों आप सब जानते हैं की इस्लाम धर्म का सबसे पाक और पवित्र शहर मक्का है जहाँ हर मुसलमान अपनी लाइफ में एक बार जरूर जाना चाहता है पर यह जगह हमेशा से ऐसी नहीं हुआ करती थी। कुछ सालों पहले यह जगह बिलकुल खाली और सुनसान हुआ करती थी जहाँ शायद ही कोई जाना चाहता हो। आज की तस्वीरें देख के ये अनुमान लगाना काफी मुश्किल है कि कुछ टाइम पहले मक्का कैसा हुआ करता था। आज हम जानेंगे 



कैसे बना है मक्का? इसके बनने के पीछे का क्या है इतिहास? 

हर धर्म में उसके तीर्थस्थान का बहुत महत्व होता है। इसी स्थल में लोगों की आस्था जुड़ी होती है। जैसे हिंदू धर्म में चारधाम की यात्रा का अपना महत्व होता है। यह यात्रा काफी पवित्र मानी जाती है। उसी तरह मुस्लिम लोग हज करने के लिए मक्का और मदीना जाते। इस्लाम में सऊदी अरब के दो शहरों मक्का और मदीना को काफी पवित्र स्थल बताया गया है। हर मुसलमान की चाहत होती है कि वो अपने जीवन में एक बार इन दोनों जगहों में जरूर जाए और मक्का में जाकर काबे का तवाफ यानी परिक्रमा करके अपने गुनाहों की माफी जरूर मांगे। इस्लाम में कवि की क्या वैल्यू है ये तो इसी बात से पता लगता है कि दुनिया भर में जितने भी मुसलमान हैं वो काबे की दिशा में ही नमाज़ को अदा करते हैं। चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में क्यों ना हों। काबा आई क्यू की इमारत है। काबा ग्रेफाइट पत्थर से बना हुआ है। इसकी लम्बाई 40 फीट और चौड़ाई 33 फीट है। इसमें कोई भी खिड़की नहीं है। बस एक दरवाज़ा है। इसमें पूर्व दिशा में लगभग पाँच फीट की ऊँचाई पर एक काला पत्थर लगा हुआ है। काबा की सात बार तवाफ़ करने के बाद सभी मुस्लिम यात्रियों को चूमते हैं। ये पत्थर उनके लिए काफी अहम है। इसके चारों ओर बनी इमारतों को मस्जिदुल हरम कहा जाता है। अब बात करते हैं इसके इतिहास की। इसके निर्माण को लेकर लोगों में काफ़ी मतभेद है। लोगों का कहना है कि काबा का निर्माण फ़रिश्तों ने आकर करा है। साथ ही लोगों का ये भी मानना है कि आज भी लगभग 70,000 फ़रिश्ते यहां काबे की तवाफ यानी परिक्रमा करने आते हैं और नमाज भी अदा करते हैं। अरब देशों के मुताबिक मक्का में काबा को लेकर एक और कहानी भी चर्चित है। कहा जाता है जब मुस्लिम के भगवान यानी अल्लाह ने पहले दो इन्सान आदम और हव्वा यानी पहली महिला और मर्द को बनाया तो इनसे नाराज होकर अल्लाह ने भी धरती पर भेज दिया। जिसके बाद ये दोनों एक दूसरे से अलग हो गए। कई सालों तक ढूंढने के बाद ये दोनों जहां मिले वो जगह मक्का थी। यहीं आदम ने हव्वा की मिलने की ख़ुशी में ख़ुदा को सजदा कर शुक्रिया अदा किया था, जिसके बाद उसी जगह में बाद में काबा का निर्माण किया गया। 

इसके साथ ही एक और कहानी भी लोगों के बीच मौजूद है, जिसके बाद ये नष्ट हो गया। फिर हजरत इब्राहीम ने अपने बेटे हज़रत इस्माइल के साथ मिलकर इस जगह का निर्माण किया था। इस्लाम धर्म के ग्रंथ कुरान के मुताबिक ये पैगंबर थे। अपने निर्माण के समय ये बिना छत वाली एक रेक्टेंगल टाइप की मारुति। लोगों का मानना है की इन दोनों कहानी का जिक्र कुरान में नहीं मिलता और इस कहानी के लिए कुरान और हदीस का रिफरेन्स इसलिए नहीं दे सकते क्यूंकि ये दोनों कहानी नबी से पहले के वक्त की बात है। इतिहासकार काबा को धार्मिक के साथ साथ एक व्यापारिक क्षेत्र बनाने का पूरा श्रेय उसी को देते हैं। यह कुरैश घराने से ताल्लुक रखता था। उसी ने अपने आप को राजा घोषित करने के साथ काबा की चाबी अपने हाथ में रखी और जर्जर हो चुके काबा को फिर से बनवाया। दूर दराज क्षेत्रों में बसे अपने कुरैश रिश्तेदारों को मक्का में लाकर बसाया। तीर्थयात्रियों से मक्का में प्रवेश से पहले कर वसूलने का प्रावधान था। जमजम के पानी पर अपना प्रभुत्व रखा कर चुकाने के बाद तीर्थयात्रियों के खाने और पीने की ज़िम्मेदारी उसी के प्रशासन की ही होती थी।

 इसके अलावा मुस्लिम मान्यताओं के हिसाब से मोहम्मद साहब ने 620 ईस्वी को मक्का से यात्रियों के लिए यात्रा शुरू की। आज यही जगह मदीना के नाम से जानी जाती है। 628 से 630 ईस्वी में जब मुहम्मद साहब वापस आए तो इस जगह को इबादतगाह के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। कावी में लगे पत्थर के बारे में कहा जाता है कि ये पत्थर इस दुनिया का नहीं बल्कि इसको हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम जन्नत से लेकर आए थे। यह इस्लाम धर्म में एक महत्वपूर्ण फ़रिश्ते के रूप में जाने जाते हैं। ये भी कहा जाता है कि जब इस पत्थर को यहां लगाया गया था तो यह सफेद रंग का था। पर दुनिया में बढ़ते पाप के साथ इसका रंग काला होता चला गया। मोहम्मद साहब ने अपनी मौत से पहले 632 ईस्वी में आखिरी बार हज यात्रा की थी। मक्का ही वो शहर है जहां से इस्लाम की शुरुआत हुई थी। अल्लाह ने मोहम्मद साहब को पैगाम दिया जिसके बाद से पूरी दुनिया में इस्लाम का प्रचार प्रसार शुरू हो गया। धीरे धीरे मक्का के आस पास शहर बसने लगे और वहां की आबादी बढ़ने लगी। समय के साथ काबा का स्वरूप बदलने लगा। 

बीते हुए सालों के साथ यहां यात्रियों की संख्या बढ़ती रही और उसी हिसाब से यहां के आसपास में डेवलपमेंट होता चला गया। ख़लीफ़ा उस्मानी 644 वीवी से 656 इस्वी तक कावा के आस पास में इमारतों का निर्माण किया। मक्का में कब्जा करने के लिए ख़लीफ़ा अब्दुल मलिक ये भी एक राजा थे ने इब्न जुबैर के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। इसी दौरान लगभग 683 ईसवी में लकड़ी के बने कावा ढाँचे को आग लगा दी गई। जिसके बाद ये पूरी तरह से नष्ट हो गया। इसके बाद इसको हज़रत इब्राहीम की डिज़ाइन के हिसाब से फिर से बनाया गया और इसके चारों ओर मस्जिद का निर्माण भी किया गया। काबा के आसपास बनी मस्जिद का कई बार निर्माण किया गया क्योंकि एक साल पहले आई बाढ़ के चलते ये पूरी तरह से बर्बाद हो गया था। ये दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। इसके बाद भी साल 1950 में बढ़ते तीर्थयात्रियों के चलते इसके स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव किए गए। आज ये मस्जिद 40 एकड़ से भी ज्यादा जमीन में फैली हुई है।

अगर आज काबा के स्ट्रक्चर की बात करें तो ये पहले से काफी ज्यादा बदल चुका है। ये क्यूबिकल शेप की इमारत है। इसका दरवाजा जो पहले किसी लकड़ी का बना था उसको साल 1982 में सोने के दरवाजा लगाकर बदल दिया गया। काबा में ढकने वाला कपड़ा पहले मिस्र से मंगाया जाता था, पर अब इसको सऊदी अरब में ही तैयार किया जाता है। मस्जिदुल हरम भी पहले की तुलना। में काफी अच्छा बन चुका है। इसमें यात्रियों की हर सुविधा का खयाल रखा जाता है। यहां हर साल लाखों की तादाद में पूरी दुनिया से मुस्लिम हज यात्रा करने आते हैं। इतने लोगों का इंतजाम करना कोई आसान काम नहीं। इसलिए पूरे साल यहां की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हज के इंतजाम में लगा रहता है। 

यहां चाहे यात्री के खाने का इन्तजाम हो या वहां होने वाली कुरबानी का काम हो या को पूरी तरह से सिस्टमेटिक तरीके से होता है। चलिए जान लेते हैं कि हज कैसे होता है? इसके यात्री सबसे पहले सफेद कपड़ा यानी अहराम बांधते हैं। यह कपड़ा कफन के समान होता है। इसमें किसी भी प्रकार की कोई सिलाई नहीं होती और साथ ही किसी भी प्रकार की कोई गंदगी भी नहीं लगी होती। फिर फ्लाइट से लेकर यात्रा तक सभी यात्री हज में पड़ी जाने वाली दुआएं पढ़ने जाते हैं। मक्का पहुंचने के बाद काबा के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। यानि की तवाफ करते हैं यानि की उसकी परिक्रमा की जाती है। फिर अराफात के मैदान में शैतान को कंकड़ मारा जाता है। फिर कुर्बानी के फर्ज को पूरा करने के लिए बाल कटवा दिए जाते हैं। इस तरह मक्का और मदीना की यात्रा को पूरी कर इंसान हज के फर्ज को पूरा कर देता है। दुनिया भर के मुस्लिम जीवन में एक बार हज की यात्रा को जरूर करना चाहते हैं।

साथ ही ये भी मान्यता है कि जो इंसान काबा में पूरे मन से मन्नत को मानता है वो जरूर पूरी होती है। सऊदी अरब और काबा का पूरी दुनिया में अलग ही महत्व है। यहां किसी भी गैरमुस्लिम को प्रवेश नहीं दिया जाता है। आप को काबा के दिया जान कर कैसा लगा ये हमें कमेंट करके कमेन्ट बॉक्स में जरूर बताएं। 

Suraj Rai

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